Transfer: तबादलों की आहट से अधिकारी परेशान, बच्चों की पढ़ाई और परिवारिक बदलाव को लेकर बढ़ी बेचैनी

transfer policy: उत्तर प्रदेश राज्य कर विभाग में शैक्षिक सत्र के बीच संभावित तबादलों की सुगबुगाहट ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। बच्चों के स्कूल, परिवार का स्थानांतरण और परीक्षा सत्र नजदीक होने के कारण अधिकारी परेशान हैं। विभाग में माहौल तनावपूर्ण है और तबादला नीति पर पुनर्विचार की मांग तेज हो गई है।

Transfer: तबादलों की आहट से अधिकारी परेशान, बच्चों की पढ़ाई और परिवारिक बदलाव को लेकर बढ़ी बेचैनी

Transfer UP Tax Departmen :  उत्तर प्रदेश राज्य कर विभाग में इस वर्ष शैक्षिक सत्र के बीच संभावित तबादलों की सुगबुगाहट शुरू होते ही अधिकारियों में बेचैनी का माहौल गहराता जा रहा है। विभाग के सचल दल (Mobile Squad) में तैनात सहायक आयुक्तों और अन्य अधिकारियों का पिछले वर्ष समय पर तबादला न होने के कारण जून की जगह जनवरी में तबादला हुआ था। यही कारण है कि इस बार भी वार्षिक तबादला प्रक्रिया जनवरी में पूरी होने की चर्चा विभागीय गलियारों में सक्रिय हो गई है। लेकिन इस बार मामला सिर्फ स्थानांतरण तक ही सीमित नहीं है,सबसे बड़ी चुनौती है बच्चों की पढ़ाई, परिवार का स्थानांतरण, और शैक्षिक सत्र के बीच उठने वाली सामाजिक-व्यावहारिक मुश्किलें।

वर्ष के बीच तबादले, परिवार और पढ़ाई ने बढ़ाई अधिकारियों की चिंता

विभागीय अधिकारियों के अनुसार, अधिकांश अधिकारी अपने परिवारों के साथ उस जिले में रह रहे हैं जहाँ उनकी वर्तमान तैनाती है। उनके बच्चों के स्कूलों में नए शैक्षणिक वर्ष के लिए दाखिले हो चुके हैं। ऐसे में यदि अचानक तबादला जनवरी में कर दिया जाता है, तो बच्चों के लिए नया स्कूल ढूँढना, मध्य सत्र में एडमिशन कराना और पढ़ाई में तालमेल बैठाना बेहद कठिन हो जाएगा।

अधिकारियों का कहना है कि स्कूल अक्सर बीच सत्र में छात्रों को प्रवेश नहीं देते, खासकर तब जब वार्षिक परीक्षा मार्च में होनी हो। कुछ अधिकारी मजबूरी में अपने परिवारों को वर्तमान शहर में ही छोड़कर नई तैनाती पर अकेले जाना पड़ सकता है। इससे पारिवारिक जिम्मेदारियों और सरकारी कामकाज दोनों पर असर पड़ने की आशंका है।

सचल दल के सहायक आयुक्तों के सामने सबसे कठिन स्थिति

राज्य कर विभाग के सचल दल में काम करने वाले सहायक आयुक्तों की जिम्मेदारी अत्यंत गतिशील और संवेदनशील होती हैं। इन अधिकारियों के बच्चे अधिकतर छोटे हैं और नियमित देखभाल तथा पारिवारिक समर्थन की आवश्यकता होती है।
ऐसे अधिकारी मानते हैं कि परिवार को छोड़कर दूसरे जिले में जाना कठिन है। अकेले रहने की स्थिति में उन्हें आए दिन परिवार से मिलने लौटना पड़ेगा। इससे सरकारी कार्य प्रभावित हो सकता है क्योंकि सचल दल का काम अचानक और लगातार फील्ड में दौड़-भाग मांगता है। परिवार साथ ले जाने पर बच्चों की पढ़ाई बीच में छूटने का खतरा है। एक अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि अगर जनवरी में तबादला होता है, तो बच्चों को बीच सत्र में स्कूल बदलना पड़ेगा। यह उनकी पढ़ाई पर बुरा प्रभाव डालने वाला फैसला होगा। 

30 जून तक तबादला नीति लागू करने की पुरानी मांग फिर हावी

राज्य कर विभाग में पहले भी यह मांग जोरदार तरीके से उठती रही है कि वार्षिक तबादला नीति का सख्ती से पालन करते हुए तबादले 30 जून तक ही कर दिए जाएँ। कारण स्पष्ट है। 30 जून तक तबादले होने पर अधिकारी नए जिले में परिवार सहित व्यवस्थित हो सकता है। बच्चों के नए स्कूल में दाखिले में कोई समस्या नहीं आती। परिवार और सरकारी कार्य के बीच संतुलन बन जाता है।

अधिकारियों का कहना है कि हर साल नियमों के बावजूद तबादलों में देरी होती है, जिससे पूरा चक्र बिगड़ जाता है। पिछले वर्ष जून की जगह जनवरी में तबादला होने से बहुत से अधिकारियों के लिए परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हुई थीं। इसलिए इस बार भी वही स्थिति न बन जाए, इसे लेकर अधिकारी चिंतित हैं।

मुख्यालय के अधिकारी मौन, फैसले का इंतजार

राज्य कर मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों से जब इस संभावित तबादला प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो अधिकांश ने इस पर टिप्पणी करने से परहेज किया। उनका कहना है कि तबादले वर्ष के हिसाब से होंगे या शैक्षिक सत्र को ध्यान में रखकर,इसका निर्णय शासन स्तर पर लिया जाता है। विभाग इस संबंध में आधिकारिक स्थिति तभी स्पष्ट करेगा जब सरकार के निर्देश प्राप्त होंगे। यह भी चर्चा चल रही है कि इस बार तबादलों में देरी हुई तो सत्र के बीच फिर वही परिस्थितियाँ पैदा होंगी जिनसे अधिकारी पहले गुजर चुके हैं।

संतुलन की तलाश

प्रबंधन विशेषज्ञों की राय है कि प्रशासनिक तबादले एक नियमित प्रक्रिया हैं, लेकिन उनके मानवीय परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अधिकारियों का कहना है कि जब स्थानांतरण की प्रक्रिया कर्मचारियों के पारिवारिक जीवन को कठिन बनाती है, तब कार्य क्षमता और प्रशासनिक परिणाम दोनों प्रभावित होते हैं। कई अधिकारियों का मानना है कि सरकार को शिक्षा सत्र को ध्यान में रखकर नीति निर्माण करना चाहिए, जिससे बच्चों की पढ़ाई और परिवार की स्थिरता जैसी मूलभूत बातें प्रभावित न हों।

अधिकारियों को बार-बार आना-जाना पड़ेगा

विभागीय सूत्र बताते हैं कि यदि अधिकारी बिना परिवार के नए जिले में जाएंगे,तो सप्ताहांत और छुट्टियों में उन्हें परिवार से मिलने लौटना पड़ेगा, इससे परिवहन समय, मानसिक थकान और कार्य की निरंतरता प्रभावित होगी, वहीं कुछ अधिकारी छोटे बच्चों के चलते अकेले नहीं रह सकते,इसलिए परिवार सहित स्थानांतरण भी पूरी तरह व्यावहारिक नहीं रह जाता।

अधिकारियों की अपील

अधिकारी चाहते हैं कि इस वर्ष विशेष परिस्थितियों को देखते हुए,तबादले जून के बाद या कम से कम मार्च में वार्षिक परीक्षा के बाद किए जाएँ। इससे न बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी, न ही अधिकारियों को मानसिक दबाव झेलना पड़ेगा।
इस मांग पर विभागीय अधिकारियों का संघ भी जल्द औपचारिक ज्ञापन देने की तैयारी में है।

Original Source - Patrika Live News

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